अल-कियामा - क़ुरान - हारुन याह्या
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1. नहीं, मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की,
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2. और नहीं! मैं कसम खाता हूँ मलामत करनेवाली आत्मा की
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3. क्या मनुष्य यह समझता है कि हम कदापि उसकी हड्डियों को एकत्र न करेंगे?
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4. क्यों नहीं, हम उसकी पोरों को ठीक-ठाक करने की सामर्थ्य रखते है
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5. बल्कि मनुष्य चाहता है कि अपने आगे ढिठाई करता रहे
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6. पूछता है, "आख़िर क़ियामत का दिन कब आएगा?"
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7. तो जब निगाह चौंधिया जाएगी,
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8. और चन्द्रमा को ग्रहण लग जाएगा,
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9. और सूर्य और चन्द्रमा इकट्ठे कर दिए जाएँगे,
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10. उस दिन मनुष्य कहेगा, "कहाँ जाऊँ भागकर?"
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11. कुछ नहीं, कोई शरण-स्थल नहीं!
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12. उस दिन तुम्हारे रब ही ओर जाकर ठहरना है
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13. उस दिन मनुष्य को बता दिया जाएगा जो कुछ उसने आगे बढाया और पीछे टाला
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14. नहीं, बल्कि मनुष्य स्वयं अपने हाल पर निगाह रखता है,
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15. यद्यपि उसने अपने कितने ही बहाने पेश किए हो
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16. तू उसे शीघ्र पाने के लिए उसके प्रति अपनी ज़बान को न चला
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17. हमारे ज़िम्मे है उसे एकत्र करना और उसका पढ़ना,
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18. अतः जब हम उसे पढ़े तो उसके पठन का अनुसरण कर,
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19. फिर हमारे ज़िम्मे है उसका स्पष्टीकरण करना
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20. कुछ नहीं, बल्कि तुम लोग शीघ्र मिलनेवाली चीज़ (दुनिया) से प्रेम रखते हो,
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21. और आख़िरत को छोड़ रहे हो
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22. किनते ही चहरे उस दिन तरो ताज़ा और प्रफुल्लित होंगे,
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23. अपने रब की ओर देख रहे होंगे।
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24. और कितने ही चेहरे उस दिन उदास और बिगड़े हुए होंगे,
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25. समझ रहे होंगे कि उनके साथ कमर तोड़ देनेवाला मामला किया जाएगा
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26. कुछ नहीं, जब प्राण कंठ को आ लगेंगे,
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27. और कहा जाएगा, "कौन है झाड़-फूँक करनेवाला?"
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28. और वह समझ लेगा कि वह जुदाई (का समय) है
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29. और पिंडली से पिंडली लिपट जाएगी,
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30. तुम्हारे रब की ओर उस दिन प्रस्थान होगा
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31. किन्तु उसने न तो सत्य माना और न नमाज़ अदा की,
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32. लेकिन झुठलाया और मुँह मोड़ा,
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33. फिर अकड़ता हुआ अपने लोगों की ओर चल दिया
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34. अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
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35. फिर अफ़सोस है तुझपर और अफ़सोस है!
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36. क्या मनुष्य समझता है कि वह यूँ ही स्वतंत्र छोड़ दिया जाएगा?
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37. क्या वह केवल टपकाए हुए वीर्य की एक बूँद न था?
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38. फिर वह रक्त की एक फुटकी हुआ, फिर अल्लाह ने उसे रूप दिया और उसके अंग-प्रत्यंग ठीक-ठाक किए
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39. और उसकी दो जातियाँ बनाई - पुरुष और स्त्री
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40. क्या उसे वह सामर्थ्य प्राप्त- नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे?
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