अल-मुताफ्फिन - क़ुरान - हारुन याह्या
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1. तबाही है घटानेवालों के लिए,
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2. जो नापकर लोगों पर नज़र जमाए हुए लेते हैं तो पूरा-पूरा लेते हैं,
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3. किन्तु जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं तो घटाकर देते हैं
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4. क्या वे समझते नहीं कि उन्हें (जीवित होकर) उठना है,
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5. एक भारी दिन के लिए,
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6. जिस दिन लोग सारे संसार के रब के सामने खड़े होंगे?
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7. कुछ नहीं, निश्चय ही दुराचारियों का काग़ज `सिज्जीन` में है
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8. तुम्हें क्या मालूम कि `सिज्जीन` क्या हैं?
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9. मुहर लगा हुआ काग़ज
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10. तबाही है उस दिन झुठलाने-वालों की,
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11. जो बदले के दिन को झुठलाते है
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12. और उसे तो बस प्रत्येक वह क्यक्ति ही झूठलाता है जो सीमा का उल्लंघन करनेवाला, पापी है
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13. जब हमारी आयतें उसे सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले की कहानियाँ है।"
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14. कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते रहे है वह उनके दिलों पर चढ़ गया है
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15. कुछ नहीं, अवश्य ही वे उस दिन अपने रब से ओट में होंगे,
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16. फिर वे भड़कती आग में जा पड़ेगे
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17. फिर कहा जाएगा, "यह वही है जिस तुम झुठलाते थे"
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18. कुछ नही, निस्संदेह वफ़ादार लोगों का काग़ज़ `इल्लीयीन` (उच्च श्रेणी के लोगों) में है।-
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19. और तुम क्या जानो कि `इल्लीयीन` क्या है? -
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20. लिखा हुआ रजिस्टर
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21. जिसे देखने के लिए सामीप्य प्राप्त लोग उपस्थित होंगे,
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22. निस्संदेह अच्छे लोग नेमतों में होंगे,
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23. ऊँची मसनदों पर से देख रहे होंगे
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24. उनके चहरों से तुम्हें नेमतों की ताज़गी और आभा को बोध हो रहा होगा,
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25. उन्हें मुहरबंद विशुद्ध पेय पिलाया जाएगा,
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26. मुहर उसकी मुश्क ही होगी - जो लोग दूसरी पर बाज़ी ले जाना चाहते हो वे इस चीज़ को प्राप्त करने में बाज़ी ले जाने का प्रयास करे -
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27. और उसमें `तसनीम` का मिश्रण होगा,
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28. हाल यह है कि वह एक स्रोत है, जिसपर बैठकर सामीप्य प्राप्त लोग पिएँगे
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29. जो अपराधी है वे ईमान लानेवालों पर हँसते थे,
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30. और जब उनके पास से गुज़रते तो आपस में आँखों और भौंहों से इशारे करते थे,
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31. और जब अपने लोगों की ओर पलटते है तो चहकते, इतराते हुए पलटते थे,
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32. और जब उन्हें देखते तो कहते, "ये तो भटके हुए है।"
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33. हालाँकि वे उनपर कोई निगरानी करनेवाले बनाकर नहीं भेजे गए थे
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34. तो आज ईमान लानेवाले, इनकार करनेवालों पर हँस रहे हैं,
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35. ऊँची मसनदों पर से देख रहे है
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36. क्या मिल गया बदला इनकार करनेवालों को उसका जो कुछ वे करते रहे है?
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