अल-वाकिया - क़ुरान - हारुन याह्या
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1. जब घटित होनेवाली (घड़ी) घटित हो जाएगी;
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2. उसके घटित होने में कुछ भी झुठ नहीं;
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3. पस्त करनेवाली होगी, ऊँचा करनेवाली थी;
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4. जब धरती थरथराकर काँप उठेगी;
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5. और पहाड़ टूटकर चूर्ण-विचुर्ण हो जाएँगे
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6. कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे
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7. और तुम लोग तीन प्रकार के हो जाओगे -
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8. तो दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली), कैसे होंगे दाहिने हाथ वाले!
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9. और बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली), कैसे होंगे बाएँ हाथ वाले!
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10. और आगे बढ़ जानेवाले तो आगे बढ़ जानेवाले ही है
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11. वही (अल्लाह के) निकटवर्ती है;
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12. नेमत भरी जन्नतों में होंगे;
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13. अगलों में से तो बहुत-से होंगे,
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14. किन्तु पिछलों में से कम ही
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15. जड़ित तख़्तो पर;
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16. तकिया लगाए आमने-सामने होंगे;
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17. उनके पास किशोर होंगे जो सदैव किशोरावस्था ही में रहेंगे,
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18. प्याले और आफ़ताबे (जग) और विशुद्ध पेय से भरा हुआ पात्र लिए फिर रहे होंगे
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19. - जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनकी बुद्धि में विकार आएगा
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20. और स्वादिष्ट॥ फल जो वे पसन्द करें;
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21. और पक्षी का मांस जो वे चाह;
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22. और बड़ी आँखोंवाली हूरें,
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23. मानो छिपाए हुए मोती हो
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24. यह सब उसके बदले में उन्हें प्राप्त होगा जो कुछ वे करते रहे
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25. उसमें वे न कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न गुनाह की बात;
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26. सिवाय इस बात के कि "सलाम हो, सलाम हो!"
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27. रहे सौभाग्यशाली लोग, तो सौभाग्यशालियों का क्या कहना!
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28. वे वहाँ होंगे जहाँ बिन काँटों के बेर होंगे;
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29. और गुच्छेदार केले;
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30. दूर तक फैली हुई छाँव;
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31. बहता हुआ पानी;
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32. बहुत-सा स्वादिष्ट; फल,
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33. जिसका सिलसिला टूटनेवाला न होगा और न उसपर कोई रोक-टोक होगी
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34. उच्चकोटि के बिछौने होंगे;
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35. (और वहाँ उनकी पत्नियों को) निश्चय ही हमने एक विशेष उठान पर उठान पर उठाया
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36. और हमने उन्हे कुँवारियाँ बनाया;
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37. प्रेम दर्शानेवाली और समायु;
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38. सौभाग्यशाली लोगों के लिए;
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39. वे अगलों में से भी अधिक होगे
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40. और पिछलों में से भी अधिक होंगे
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41. रहे दुर्भाग्यशाली लोग, तो कैसे होंगे दुर्भाग्यशाली लोग!
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42. गर्म हवा और खौलते हुए पानी में होंगे;
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43. और काले धुएँ की छाँव में,
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44. जो न ठंडी होगी और न उत्तम और लाभप्रद
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45. वे इससे पहले सुख-सम्पन्न थे;
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46. और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे
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47. कहते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रहे जाएँगे, तो क्या हम वास्तव में उठाए जाएँगे?
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48. "और क्या हमारे पहले के बाप-दादा भी?"
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49. कह दो, "निश्चय ही अगले और पिछले भी
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50. एक नियत समय पर इकट्ठे कर दिए जाएँगे, जिसका दिन ज्ञात और नियत है
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51. "फिर तुम ऐ गुमराहो, झुठलानेवालो!
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52. ज़क्कूम के वृक्ष में से खाओंगे;
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53. "और उसी से पेट भरोगे;
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54. "और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीओगे;
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55. "और तौस लगे ऊँट की तरह पीओगे।"
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56. यह बदला दिए जाने के दिन उनका पहला सत्कार होगा
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57. हमने तुम्हें पैदा किया; फिर तुम सच क्यों नहीं मानते?
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58. तो क्या तुमने विचार किया जो चीज़ तुम टपकाते हो?
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59. क्या तुम उसे आकार देते हो, या हम है आकार देनेवाले?
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60. हमने तुम्हारे बीच मृत्यु को नियत किया है और हमारे बस से यह बाहर नहीं है
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61. कि हम तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में उठा खड़ा करें जिसे तुम जानते नहीं
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62. तुम तो पहली पैदाइश को जान चुके हो, फिर तुम ध्यान क्यों नहीं देते?
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63. फिर क्या तुमने देखा तो कुछ तुम खेती करते हो?
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64. क्या उसे तुम उगाते हो या हम उसे उगाते है?
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65. यदि हम चाहें तो उसे चूर-चूर कर दें। फिर तुम बातें बनाते रह जाओ
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66. कि "हमपर उलटा डाँड पड़ गया,
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67. बल्कि हम वंचित होकर रह गए!"
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68. फिर क्या तुमने उस पानी को देखा जिसे तुम पीते हो?
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69. क्या उसे बादलों से तुमने पानी बरसाया या बरसानेवाले हम है?
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70. यदि हम चाहें तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें। फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते?
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71. फिर क्या तुमने उस आग को देखा जिसे तुम सुलगाते हो?
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72. क्या तुमने उसके वृक्ष को पैदा किया है या पैदा करनेवाले हम है?
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73. हमने उसे एक अनुस्मृति और मरुभुमि के मुसाफ़िरों और ज़रूरतमन्दों के लिए लाभप्रद बनाया
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74. अतः तुम अपने महान रब के नाम की तसबीह करो
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75. अतः नहीं! मैं क़समों खाता हूँ सितारों की स्थितियों की -
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76. और यह बहुत बड़ी गवाही है, यदि तुम जानो -
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77. निश्चय ही यह प्रतिष्ठित क़ुरआन है
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78. एक सुरक्षित किताब में अंकित है।
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79. उसे केवल पाक-साफ़ व्यक्ति ही हाथ लगाते है
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80. उसका अवतरण सारे संसार के रब की ओर से है।
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81. फिर क्या तुम उस वाणी के प्रति उपेक्षा दर्शाते हो?
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82. और तुम इसको अपनी वृत्ति बना रहे हो कि झुठलाते हो?
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83. फिर ऐसा क्यों नहीं होता, जबकि प्राण कंठ को आ लगते है
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84. और उस समय तुम देख रहे होते हो -
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85. और हम तुम्हारी अपेक्षा उससे अधिक निकट होते है। किन्तु तुम देखते नहीं –
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86. फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि यदि तुम अधीन नहीं हो
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87. तो उसे (प्राण को) लौटा दो, यदि तुम सच्चे हो
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88. फिर यदि वह (अल्लाह के) निकटवर्तियों में से है;
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89. तो (उसके लिए) आराम, सुख-सामग्री और सुगंध है, और नेमतवाला बाग़ है
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90. और यदि वह भाग्यशालियों में से है,
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91. तो "सलाम है तुम्हें कि तुम सौभाग्यशाली में से हो।"
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92. किन्तु यदि वह झुठलानेवालों, गुमराहों में से है;
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93. तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा
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94. फिर भड़कती हुई आग में उन्हें झोंका जाना है
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95. निस्संदेह यही विश्वसनीय सत्य है
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96. अतः तुम अपने महान रब की तसबीह करो
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