अल-मुर्सलत - क़ुरान - हारुन याह्या
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1. साक्षी है वे (हवाएँ) जिनकी चोटी छोड़ दी जाती है
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2. फिर ख़ूब तेज़ हो जाती है,
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3. और (बादलों को) उठाकर फैलाती है,
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4. फिर मामला करती है अलग-अलग,
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5. फिर पेश करती है याददिहानी
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6. इल्ज़ाम उतारने या चेतावनी देने के लिए,
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7. निस्संदेह जिसका वादा तुमसे किया जा रहा है वह निश्चित ही घटित होकर रहेगा
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8. अतः जब तारे विलुप्त (प्रकाशहीन) हो जाएँगे,
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9. और जब आकाश फट जाएगा
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10. और पहाड़ चूर्ण-विचूर्ण होकर बिखर जाएँगे;
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11. और जब रसूलों का हाल यह होगा कि उन का समय नियत कर दिया गया होगा -
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12. किस दिन के लिए वे टाले गए है?
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13. फ़ैसले के दिन के लिए
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14. और तुम्हें क्या मालूम कि वह फ़ैसले का दिन क्या है? -
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15. तबाही है उस दिन झूठलाने-वालों की!
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16. क्या ऐसा नहीं हुआ कि हमने पहलों को विनष्ट किया?
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17. फिर उन्हीं के पीछे बादवालों को भी लगाते रहे?
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18. अपराधियों के साथ हम ऐसा ही करते है
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19. तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
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20. क्या ऐस नहीं है कि हमने तुम्हे तुच्छ जल से पैदा किया,
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21. फिर हमने उसे एक सुरक्षित टिकने की जगह रखा,
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22. एक ज्ञात और निश्चित अवधि तक?
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23. फिर हमने अन्दाजा ठहराया, तो हम क्या ही अच्छा अन्दाज़ा ठहरानेवाले है
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24. तबाही है उस दिन झूठलानेवालों की!
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25. क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को समेट रखनेवाली बनाया,
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26. ज़िन्दों को भी और मुर्दों को भी,
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27. और उसमें ऊँचे-ऊँचे पहाड़ जमाए और तुम्हें मीठा पानी पिलाया?
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28. तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
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29. चलो उस चीज़ की ओर जिसे तुम झुठलाते रहे हो!
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30. चलो तीन शाखाओंवाली छाया की ओर,
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31. जिसमें न छाँव है और न वह अग्नि-ज्वाला से बचा सकती है
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32. निस्संदेह वे (ज्वालाएँ) महल जैसी (ऊँची) चिंगारियाँ फेंकती है
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33. मानो वे पीले ऊँट हैं!
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34. तबाही है उस झुठलानेवालों की!
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35. यह वह दिन है कि वे कुछ बोल नहीं रहे है,
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36. तो कोई उज़ पेश करें, (बात यह है कि) उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी जा रही है
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37. तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की
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38. "यह फ़ैसले का दिन है, हमने तुम्हें भी और पहलों को भी इकट्ठा कर दिया
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39. "अब यदि तुम्हारे पास कोई चाल है तो मेरे विरुद्ध चलो।"
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40. तबाही है उस दिन झुठलानेवालो की!
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41. निस्संदेह डर रखनेवाले छाँवों और स्रोतों में है,
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42. और उन फलों के बीच जो वे चाहे
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43. "खाओ-पियो मज़े से, उस कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे हो।"
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44. निश्चय ही उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते है
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45. तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
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46. "खा लो और मज़े कर लो थोड़ा-सा, वास्तव में तुम अपराधी हो!"
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47. तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
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48. जब उनसे कहा जाता है कि "झुको! तो नहीं झुकते।"
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49. तबाही है उस दिन झुठलानेवालों की!
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50. अब आख़िर इसके पश्चात किस वाणी पर वे ईमान लाएँगे?
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